कुशीनगर : नहाय-खाय के बाद शुरू हो जाएगा कुशीनगर मे सूर्य षष्ठी व्रत

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डेस्क, कुशीनगर केसरी कुशीनगर(१० नवम्बर)। कार्तिक शुक्ल पक्ष चतुर्थी अर्थात 11 नवम्बर को ‘नहाय-खाय के साथ सूर्योपासना का महापर्व सूर्य षष्ठी व्रत (छठ) प्रारंभ होगा। 12 नवम्बर को खरना,13 नवम्बर को सूर्यदेव को सायंकालीन अर्घ्य तथा 14 नवम्बर को प्रात:कालीन अर्घ्य देने के साथ ही व्रत-पर्व संपन्न होगा।
लोक आस्था व भगवान सूर्य की आराधना का महापर्व छठ को लेकर प्रातः उठकर व्रती महिलाओं ने गंगा स्नान करने के बाद विधि-विधान पूर्वक पूजा- अर्चना कर कद्दू व सरसो के साग के साथ सात्विक भोजन ग्रहण किया। छठ पूजा की पूर्णाहुति बुधवार को उगते हुए भगवान भास्कर को अध्य देने के बाद संपन्न होगी।
गौरतलब है कि यूपी और बिहार मे मनाये जाने वाला छठ महापर्व अब पूरे देश मे आस्था व विश्वास के साथ मनाया जाता है। आज दिन रबिवार से नहाय खाय के साथ शुरू हुआ भगवान तपन का यह महापर्व उगते हुए भगवान मार्तड को अध्य देने तक कुल चार चरणो मे संपन्न होती है।ज्योतिषाचार्य पं आशूतोष महाराज के अनुसार पहले दिन की पूजा के बाद से नमक का त्याग कर दिया जाता है। छठ पर्व के दुसरे दिन को खरना के रुप मे मनाया जाता है। इस दिन भूखे-प्यासे रहकर खीर का प्रसाद तैयार करती है। महत्वपूर्ण बात है कि यह खीर गन्ने के रस की बनी होती है इसमे चीनी व नमक का प्रयोग नही किया जाता है। सायंकाल इस प्रसाद को ग्रहण करने के बाद माताए निर्जल व्रत की शुरुआत करती है। पहले दिन मंगलवार के शाम डूबते हुए भगवान लोक प्रकाशक को अध्य देगी। चौथे व आखिरी दिन बुधवार को उगते हुए भगवान गृहश्वेर की पूजा करेगी। उसके बाद व्रती महिलाए कच्चा दूध व प्रसाद ग्रहण करके व्रत व पूजा की पूर्णाहुति करेगी।

छठ महापर्व पर गीत षष्ठी देवी के गाए जाते हैं, लेकिन आराधना भगवान सूर्य की होती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, सूर्य और षष्ठी देवी भाई-बहन हैं। मान्यता है कि सुबह और शाम सूर्य की अरुणिमा में षष्ठी देवी निवास करती हैं। इसलिए भगवान सूर्य के साथ षष्ठी देवी की पूजा होती है। षष्ठी महापर्व की पूर्णाहुति चतुर्थ दिन उगते सूर्य को अर्घ्‍य देने के साथ संपन्न होती है। इस दिन सूर्योदय 6.31 बजे है। अर्घ्य देने के बाद व्रती महिलाएं पारन (अल्‍पाहार) करेंगी। षष्ठी के दिन यानी को पूर्वाह्न में वेदी पर जाकर छठ माता की पूजा करें। फिर घर लौट आएं। अपराहन घाट पर वेदी के पास जाए। पूजन सामग्री वेदी पर चढ़ाएं व दीप जलाएं। सूर्यास्त 5.28 बजे है, इसलिए अस्ताचलगामी सूर्य को दीप दिखाकर प्रसाद अर्पित करें। दूध और जल चढ़ाएं, फिर दीप जल में प्रवाहित करें। व्रता वेला (सुबह) में परिजनों के साथ निकल जाएं और घाट पर पहुंचें और व्रती पानी में खड़े होकर सूर्य उदय की प्रतीक्षा करें। सूर्य का लाल गोला जब दिखने लगे तो दीप अर्पित कर उसे जल में प्रवाहित करें। फिर हाथ से जल अर्पित करें। दूध चढ़ाएं और भगवान शुचि ?(सूर्य) को अर्पित करे

लोक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव के तेज से उत्पन्न बालक स्कंद को छह कृतिकाओं ने अपना स्तनपान कराकर उसकी रक्षा की थी। उस समय स्कंद के छह मुख हो गए थे। कृतिकाओं द्वारा उन्हें दुग्धपान कराया गया था, इसलिए ये कार्तिकेय कहलाए। लोकमान्यता यह भी है कि यह घटना जिस मास में घटी थी उस मास का नाम कार्तिक पड़ गया इसलिए छठ मइया की पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को किया जाता है। सूर्य षष्ठी पूजा में ऋतुफल के अतिरिक्त आटा, गुड़ और घी से निर्मित ठेकुआ प्रसाद होना अनिवार्य है। इस पर सांचे से भगवान प्रकाश रुप के रथ का चक्र अंकित किया जाता है। पूजा सामग्री में पांच तरह के फल, मिठाइयां, गन्ना, केले, नारियल, पाइनेपल, नींबू, शकरकंद, अदरक नया अनाज शामिल होता है।

व्रती सीमा देवी व कामनी श्रीवास्तव कहती है महिलाएं पूजा सामग्री सजाती है जिसे पुरुष शाम को नए बांस के डाले में रखकर जलस्रोत किनारे ले जाते है। महिलाएं पानी में खड़ी होकर अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देंगी। अगले दिन सुबह पूजा सामग्री के साथ अंकुरित चने दही लेकर फिर झील पर पहुंच पानी में खड़े हो उदय होते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा।

छठ मइया के गीत

छठ की बात हो और साथ में परम्परागत लोक गीतों की बात न हो तो पर्व की बात करना बेमानी हो जायेगा। छठ गीतों की लय कान में पड़ते ही हर कोई बरबस ही गुनगुना उठता है। वैसे तो सोशल साइट पर दर्जनों कलाकारों के गीत मौजूद हैं,महुआ टीबी पर हो चुके नहले पे दहला प्रोग्राम के बिजेता सिंगर आकाश मिश्रा की माने तो श्री मिश्रा कहते है की प्रख्यात लोकगायिका कल्पना, शारदा सिन्हा और मालिनी अवस्थी के गाए गीत मन मस्तिष्क पर दस्तक देने लगती है हालाकी सिंगर आकाश मिश्रा का भी इस पर्व को लेकर इनका भी गीत लेहब टिकट अर्जेन्ट ऐ धनिया सोशल मीडियां पर धुम मचाया हुआ है । दुसरी ओर षष्ठी महापर्व पर बजने वाला देबी गीतो मे “जल्दी जल्दी उगी न हे सुरुज देव…अरघा के बेर… गीत हो या कांच ही बांस के बहंगिया,बहंगी लचकत जाय…हर गीत लोक आस्था और पर्व की महत्ता को रेखांकित करता है।

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