बगहा : बच्चों में मोबाइल कंप्यूटर ने बढ़ाई परिवारिक दूरियांं

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विजय कुमार शर्मा, kknews24/कुुुशीनगर केेसरी बिहार(१२ जनवरी, शनिवार)। आधुनिकता के इस दौर में जहां प्रत्येक बच्चे-बूढ़े का रूझान मोबाइल, कम्प्यूटर या फिर लैपटॉप की ओर बढ़ रहा है, वहीं स्कूली छात्र भी कुछ हद तक इन आधुनिक तकनीकों के जाल में फंस कर अपनी पढ़ाई-लिखाई व पारिवारिक रिश्तों से दूरी बनाते दिखाई दे रहे हैं। आज इन बच्चों के परिजन व अध्यापक जब उन्हें मोबाइल, कम्प्यूटर या लैपटॉप पर काम करते देखते हैं तो गर्व महसूस करते हैं कि उनके बच्चे भविष्य में कोई नया कीॢतमान स्थापित कर अपने परिजनों के साथ-साथ अध्यापकों का भी नाम रोशन करेंगे, लेकिन परिजनों व अध्यापकों को इस बात का जरा भी अहसास नहीं होता है कि शुरूआती कक्षाओं में ही बच्चों का इस तरह से मोबाइल, कम्प्यूटर में व्यस्त होना उनके सर्वपक्षीय विकास पर प्रभाव डालेगा।

5वीं से 9वीं कक्षा के छात्र बनाए कम्प्यूटर से दूरी 

सरकार की केंद्रीय शिक्षा सलाहकार समिति की मानें तो उनकी ओर से यह स्पष्ट किया जा चुका है कि 5वीं से 9वीं कक्षा के सभी छात्रों को कम्प्यूटर से दूरी बनाए रखनी चाहिए ताकि उनके कोमल मस्तिष्क पर कोई बुरा प्रभाव न पड़ सके क्योंकि इसी उम्र में बच्चों के मस्तिष्क का तो विकास होता ही है वहीं इसी विकास के चलते बच्चों का शरीरिक, मानसिक व बौद्धिक विकास भी होता है। मानसिक व बौद्धिक विकास के लिए किताबें ही अपना अहम रोल अदा कर सकती हैं लेकिन जिस तरह से आज मोबाइल, कम्प्यूटर के सामने बच्चे अपनी आंखें टिकाए बैठते हैं, वह उनके लिए एक खतरे की घंटी के समान है क्योंकि जहां इससे आंखों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। वहीं मनुष्य के मानसिकता पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है
इस संबंधी बच्चों के माता-पिता को चाहिए कि वे मासूम बच्चों को मोबाइल पर यू-ट्यूब आदि दिखाने की अपेक्षा उन्हें बिल्डिंग ब्लाक, पेंटिंग आदि का सामान दें ताकि बच्चों में क्रिएटिव माइंड उत्पन्न हो। माता-पिता बचपन में ही बच्चों को मोबाइल, कम्प्यूटर चलाता देखकर खुश हो जाते हैं कि उनके बच्चे बहुत कुछ सीख रहे हैं, परंतु उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं होता कि इससे उनके बच्चों का शरीरिक, मानसिक व बौद्धिक विकास पूर्ण रूप से रुक रहा है। युवावस्था में युवाओं के कम्प्यूटर, मोबाइल पर लगे रहने से बच्चों में चिड़चिड़ा पन व स्वभाविक तौर पर गुस्से में रहना, यहां तक कि इनके दिमाग पर भी बुरा प्रभाव डाल सकता है।

मानसिक विकारों का शिकार हो रहे बच्चे

आज बच्चों की कम्प्यूटर के प्रति रुचि को देखकर जिले में कई कम्प्यूटर सैंटर स्थापित हो चुके हैं लेकिन इन सैंटरों के माध्यम से बच्चों को क्या हासिल हो रहा है। इस बात की जानकारी तो शायद उनके परिजनों को भी नहीं है। आज छोटे-छोटे बच्चे कम्प्यूटर के इतने नुक्से जान चुके हैं कि जब वे कम्प्यूटर पर काम कर रहे होते हैं तो वे किसी सॉफ्टवेयर इंजीनियर से कम दिखाई नहीं देते लेकिन जरा सोचा जाए कि यह सब उनके किस काम का है। उन्हें तो बस कम्प्यूटर का पाठ्यक्रम ही पूरा करना है। इतना ही नहीं आज के समय में सभी स्कूली छात्रों को सोशल साइट का ज्ञान है और इसी ज्ञान के चलते वह अंजाने में कई गुल खिलाकर मानसिक विकारों का शिकार बन रहे हैं। बच्चों का भविष्य उनके अभिभावकों व अध्यापकों के हाथ में ही होता है और अगर वे अपने सही कत्र्तव्य को पूरा करने में कोताही करते हैं तो यकीन के साथ कहा जा सकता है कि आने वाले समय में आज के युवा बच्चे का भविष्य सुनहरा तो नहीं, लेकिन घातक जरूर साबित होगा। उन्होंने कहा कि यदि देखा जाए तो बच्चों के माता-पिता तो इस बात को लेकर चिंतित हैं कि उनके बच्चे किसी भी तरह से कम्प्यूटर के चंगुल से आजाद रहें लेकिन उन्हें बच्चों को आजाद करवाने के लिए कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा जोकि उनके लिए ङ्क्षचता का विषय बना हुआ है।

जटिल और नीरस पाठ्यक्रम के कारण छात्रों में उदासीनता

आजकल आपने देखा होगा कि छात्रों की किताबों में जो पाठ्य सामग्री मौजूद है, वह एक तो वैसे ही जटिल है और ऊपर से नीरस भी। इस पाठ्यक्रम के कारण छात्र वैसे ही पढ़ाई से अपना दिल चुरा रहे हैं और ऊपर से कम्प्यूटर में व्यस्तता उनके दिमाग पर पढ़ाई के प्रतिकूल असर डाल रही है। अब तो निजी स्कूलों के अध्यापक भी छात्रों का रूझान जबरन कम्प्यूटर की ओर ला रहे हैं। अध्यापक बच्चों को जो ज्ञान दे रहे हैं, बच्चे उनका हल ढूंढने के लिए इंटरनैट का सहारा ले रहे हैं और उसके बाद धीरे-धीरे सोशल साइटों का प्रयोग कर मानसिक विकारों से ग्रस्त हो रहे हैं।


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