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सम्पादकीय :::: दारू के खेल में पिसते हैं उस क्षेत्र के एसओ, बच जाते हैं असली दोषी

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आदित्य प्रकाश श्रीवास्तव(०८ फरवरी)। बिहार में जबसे नितीश सरकार ने शराब की बन्दी किया है तबसे उत्तर प्रदेश में चाहे कच्ची दारू हो, हरियाणा व पंजाब निर्मित शराब हो सबके तस्करी का केन्द्र कुशीनगर बनता जा रहा है। पुलिस हर बार तस्करी का शराब पकड़ती है और तस्करी फिर दोगुने पैमाने पर बढ़ जाता है। अभी हाल में हींं हुए तरयासुजान काण्ड इसका जीता जागता प्रमाण है। जब-जब दारू से मरने वालों की घटना घटती है तब-तब केवल थानेदार पर गाज गिरती है और अन्य दोषियों पर क्यों नहीं ? यह सवाल हमेशा कचोटता रहता है। मैं ये नहीं कहता कि थानेदार दोषी नहीं हो सकता लेकिन सभी ये कैसे भूल जाते हैं कि इसका सबसे ज्यादा जिम्मेदार अबकारी विभाग होता है। आखिर में आबकारी अधिकारी पर या उसके हल्का निरिक्षक पर गाज क्यों नहीं गिरती है ? अब सवाल यह भी कचोटता है कि जब थानेदार पर गाज गिरती है तो वहां के सीओ पर क्यों नहीं गिरती है ? शासन भी सौतेला व्यवहार क्यों करता है यह बात समझ से परे है। आखिर में केवल थानेदार हीं दोषी कैसे है ? अबकारी विभाग शराब का इकलौता विभाग है। जब अच्छा कार्य होता है तो अबकारी अपना पीठ थपथपाता है तो जब कोई भी जनता शराब से मरती है तो अबकारी जिम्मेदारी क्यों नहीं लेता है ? 

    बेशक ! यहां कहना लाजमी होगा कि जब शराब का कार्य अवैध रूप से चलता है तो इसमें कहीं ना कहीं मिलीभगत आबकारी विभाग के अधिकारियों की होती है। जब अवैध शराब के पीने से लोगों की मौत होती है तो गाज वहां के थानेदारों पर गिर जाती है और मरता क्या न करता थानेदार भी विभाग का पालन करते हुए सहर्ष सजा को भोगने के लिए तैयार हो जाते हैं लेकिन अबकारी पर गाज क्यों नहीं गिरती है ? यह समझ से परे है। जब आबकारी विभाग अवैध शराब और शराब की तस्करी का दोषी नहीं है तो थानेदार कैसे हैं यह भी सवाल हमेशा कचोटता रहता है। मैं यह नहीं कहता कि थानेदार पर गाज नहीं गिरे लेकिन उस विभाग के अधिकारियों पर भी गाज गिरनी चाहिए। जिसकी निगरानी में कच्ची का खेल हमेशा होता रहता है और माफियाओं द्वारा कच्ची का खेल खेला जाता है। उन परिवारों को न्याय मिलना चाहिए जिसके सदस्यों की मौत होती है लेकिन असली दोषियों पर भी गाज गिरनी चाहिए।

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Aditya Prakash Srivastva