पश्चिमी चम्पारण बगहा बिहार राज्य

बगहा(प.च.) :: मिनी चम्बल के नाम से जानेे वाला गांव आज भी सरकारी योजनाओ से है कोशो दूर

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विजय कुमार शर्मा, बिहार(१४ अप्रैल)। बगहा प्रखण्ड एक मे ऐसा गाँव है जो एक दिन मिनी चम्बल के नाम से जाना जाता था। आज भी सरकारी योजनाओंं से आज भी कोशो दूर है।

गौरतलब है कि चौतरवा थाना क्षेत्र अंतर्गत बगहा एक प्रखंड के इंग्लिशिया पंचायत में स्थित तरकुलवा गाँव आजादी के पहले का दंश झेल रहा हैं।यह गाँव विकास तो दूर, मूलभूत सुविधाओं के लिए भी तरस रहा है।लगभग तेरह सौ आबादी वाला यह गाँव सरकारी उदासीनता के साथ साथ दैविक प्रकोप का शिकार भी होता रहा है। 90 के दशक में इस गाँव को मिनी चम्बल के नाम से जाना जाता था।उस समय दिन के समय में भी लोगों के घर की खिड़कियां व दरवाजे बंद रहती थी। कुख्यात दस्यु सरगना सुखल चौधरी का आतंक चरम पर था। उस समय के प्रत्यक्षदर्शी मिथिलेश उपाध्याय ने बताया कि सुखल द्वारा गाँव के लोगों को चुन चुन कर निशाना बनाया जाता था। सीताराम पाण्डेय, माधव चौबे को जान से मारने के बाद केदार दुबे को भी मार दिया था। केदार दुबे के साथ मैं भी था मेरे छाती व बाँह में गोली लगी हैं। इस गाँव के लोग काफी त्रस्त थे, गाँव के लोग पलायन के लिए मजबूर थे। आज धिरे-धिरे समय के साथ-साथ बहुत परिवर्तन हुआ। आस तो जगी लेकिन निराशा ही हाथ लगी। बरसात के महीनों में कभी बाढ़ तो कभी चैत बैसाख के महीनों में अगलगी ने इस गाँव को कभी भी उपजने का मौका ही नहीं दिया।

विगत दो वर्ष भूतपूर्व पहले इस गाँव में भीषण आग लगा था जिसमें लगभग साढ़े तीन सौ घर एक साथ जलकर आग के लपेटे में राख हो गया था यहाँ तक कि इस गाँव के लोग खाने पीने के लिए दाने दाने के मोहताज हो गए थे।प्रशासन के द्वारा 6000 हजार रुपया के अलावा और कुछ भी सामग्री नहीं मिला, वो भी1000 हजार रुपये घुस देने पर। सांसद, विधायक के द्वारा सिर्फ सिर्फ़ झूठा आश्वासन मिला। आज भी यहाँ के गरीब लोगों को जले हुए घर की मुआवजे की आस बनी हुई हैं। इस गाँव में न तो सांसद निधि द्वारा ही कभी कोई काम हुआ है और न विधायक निधि द्वारा कहा जाता है कि अपना काम बनता तो भाड़ में जाए जनता जब जब चुनावी बिगुल बजती है तभी नेता जी को यह गाँव की याद आती है। आज भी इस गाँव के मुख्य सड़क पर सालों भर जलजमाव बनी रहती हैं। जहा बिहार सरकार के द्वारा चलाया गया सात निश्चय यौजना की सुध लेने वाला कोई नही है गांव के लगभग आधे से ज्यादा आबादी के लोग सड़क के लिए तरसते हैं,अपने ही घर में कैदी बन के रह गए हैं। इसकी शिकायत समय समय पर स्थानीय मुखिया, सांसद, विधायक आदि से होता रहा है। नल जल योजना यहाँ बुरी तरह विफल है, न तो यहाँ शुद्ध जल पीने को मय्यसर होता हैं और न इस गांव में कहीं नाली की व्यवस्था है। ओडीएफ के नाम पर यहाँ कोई कार्य नहीं हुआ है। आज भी लोग सुबह में सड़क व नहर के किनारे लोग शौच करते हुए मिलेंगे।

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Aditya Prakash Srivastva

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